✍️निलंबित सिपाही शेर सिंह के ‘इस्तीफे’ पर उठे सवाल, आपराधिक मामले और सेवा स्थिति पर फिर छिड़ी बहस👉

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दिल्ली में आंदोलन के मंच से इस्तीफे की घोषणा के बाद निलंबन और लंबित आपराधिक प्रकरण को लेकर चर्चाएं तेज
देहरादून। दिल्ली में चल रहे CJP के आंदोलन के दौरान उत्तराखंड पुलिस के लंबे समय से निलंबित सिपाही शेर सिंह द्वारा मंच से कथित इस्तीफे की घोषणा के बाद उसके सेवा संबंधी दर्जे और इस्तीफे की वैधता को लेकर सवाल उठने लगे हैं। शेर सिंह सितंबर 2025 से निलंबित है और उसके विरुद्ध हरिद्वार के गंगनहर थाने में धोखाधड़ी, जालसाजी, आपराधिक साजिश समेत विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज है।
प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, जांच में शेर सिंह का नाम हरिद्वार-रुड़की क्षेत्र के कुख्यात गैंगस्टर प्रवीण वाल्मीकि के गिरोह से जुड़ा सामने आया था। आरोप है कि उसने अन्य आरोपियों के साथ मिलकर लोगों को धमकाकर भूमि पर अवैध कब्जा कराने और उससे आर्थिक लाभ अर्जित करने में सहयोग किया। एक विधवा महिला की भूमि पर कथित अवैध कब्जे और फर्जी बिक्री के मामले में भी उसकी भूमिका की जांच हुई थी।
विज्ञप्ति में दावा किया गया है कि शेर सिंह ने पुलिस कर्मी रहते हुए अपने पद का दुरुपयोग कर जेल और न्यायालय में गैंगस्टर से मुलाकात की तथा पीड़ित पक्ष पर मुकदमा वापस लेने का दबाव बनाने का प्रयास किया। पर्याप्त साक्ष्य मिलने के बाद उसे 15 सितंबर 2025 को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था। बाद में 7 नवंबर 2025 को उसे उच्च न्यायालय से जमानत मिली, जबकि गिरफ्तारी के बाद ही उसे विभाग द्वारा निलंबित कर दिया गया था।
इसी पृष्ठभूमि में दिल्ली के आंदोलन के मंच से दिए गए उसके कथित इस्तीफे को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। चर्चा इस बात की है कि लंबे समय से निलंबित और सक्रिय सेवा से बाहर चल रहे व्यक्ति द्वारा सार्वजनिक रूप से इस्तीफा देने की घोषणा का वास्तविक प्रशासनिक महत्व क्या है, या यह केवल प्रतीकात्मक कदम है।

(नोट: यह समाचार संबंधित पक्ष द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति और उसमें लगाए गए आरोपों पर आधारित है। इन आरोपों पर अंतिम निर्णय न्यायालय एवं संबंधित विभागीय प्रक्रिया के अधीन है।)


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