✍️बनबसा में महिला ग्राम प्रधान से अभद्रता मामले में 10 दोषी, पांच-पांच साल की सजा👉

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चम्पावत UK.                                                        चम्पावत👉 बनबसा थाना क्षेत्र के गुदमी गांव में वर्ष 2024 में अनुसूचित जनजाति की महिला ग्राम प्रधान विनिता राणा के साथ हुई मारपीट, जातिसूचक शब्दों के प्रयोग और सार्वजनिक रूप से अपमानित करने के मामले में विशेष सत्र न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट) चम्पावत की अदालत ने 10 आरोपियों को दोषी करार दिया है। अदालत ने सभी दोषियों को एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(d) के तहत पांच-पांच वर्ष के साधारण कारावास और 10-10 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है।

मामला 10 जुलाई 2024 का है। न्यायालय के निर्णय के अनुसार बाढ़ प्रभावित गुदमी गांव में राहत सामग्री वितरण के दौरान ग्राम प्रधान विनिता राणा के साथ गाली-गलौज, धक्का-मुक्की, जातिसूचक शब्दों का प्रयोग करने, उन्हें राहत सामग्री वितरण स्थल से रोकने तथा गले में जूतों की माला डालकर सार्वजनिक रूप से अपमानित करने के आरोप सामने आए थे।

मामले में हेमा खड़ायत, लीला डिगारी, जांकी कलौनी, दिनेश कलौनी, रोहित जेम्स, पिंकी जेम्स उर्फ सारिका, निखिल जेम्स उर्फ अमन, संजीव सिंह, निर्मला डिगारी और संदीप लॉरेंस को आरोपी बनाया गया था। अदालत ने सुनवाई के बाद सभी 10 आरोपियों को भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं तथा एससी/एसटी एक्ट की धाराओं के तहत दोषसिद्ध किया।

अदालत ने प्रत्येक दोषी को बीएनएस की धारा 115, 126, 192, 351, 352 और 221 के तहत 2-2 हजार रुपये जुर्माना तथा एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(d) के तहत पांच वर्ष का साधारण कारावास व 10 हजार रुपये जुर्माना, जबकि धारा 3(1)(m), 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत दो-दो वर्ष का साधारण कारावास व 5-5 हजार रुपये जुर्माने से दंडित किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि कारावास की सजाएं एक साथ चलेंगी।

जुर्माना अदा नहीं करने की स्थिति में अलग-अलग धाराओं के तहत अतिरिक्त साधारण कारावास का प्रावधान भी किया गया है। इसके अलावा अदालत ने पीड़िता विनिता राणा को दोषियों से वसूल जुर्माने में से एक लाख रुपये प्रतिकर देने का आदेश दिया है। राज्य सरकार की ओर से भी पीड़िता को एक लाख रुपये प्रतिकर दिए जाने के लिए जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, चम्पावत को कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।

अदालत ने सभी दोषियों को सजा काटने के लिए जिला कारागार पिथौरागढ़ भेजने के आदेश दिए हैं। साथ ही उन्हें निर्णय और दंडादेश के खिलाफ उत्तराखंड हाईकोर्ट में अपील करने के अधिकार से अवगत कराया गया है।


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